इतिहास

जब निको दिन आई है बनत न लगिहे देर - हर बुरे दिन के बाद अच्छा दिन आता है | मुक्तिधाम इसका प्रत्यक्ष उदहारण है सादियोसे इस गौरव मयी "दो -हरी" श्री राम व् परसुराम की मिलन स्थली जिसको आज हम सब दोहरीघाट के नाम से जानते है यह बाबा भोले नाथ की परम पबित्र कासी नगरी के परिक्षेय में आता है इसलिए इसको काशी क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है माँ सरयू के दक्षिणी पूर्वी द्वार पर बसा यह नगर इसलिए भी धार्मिक दृष्टी से महत्वपूर्ण मान जाता है | क्योकि यहाँ दो किलो मीटर तक माँ सरयू सीधे उत्तर दिशा को बहती है | यहाँ बड़े -बड़े ऋषि -महर्सी तपस्वी व् संत महात्मा बर्सो तक साधना किये है | और समय आने पर समाधी तक ले लिए है, ऐसे संत महात्माओ में संत सिरोमणि परम पूज्य श्रेद्धेय नागा बाबा खाकी बाबा श्रेद्धेय मेला राम बाबा श्रेद्धेय रमैया दास जिनके तप बल की अनेको कहानियां आगे मिलेंगी भगवान श्री राम द्वारा स्थापित "गौरी शंकर" के भब्य मंदिर के नाते इस स्थान की दूर -दूर तक चर्चा है | ऐसे महतवपूर्ण और भूत भावन भगवान शिव की साक्षात् उपस्थिति में, माँ सरयू की पावन पबित्र तट पर कौन अपने परिजन का दाह संस्कार नहीं करना चाहेगा | लोग तो अपने परिजन के पार्थिव शरीर को यहाँ इस सोच के साथ मुखाग्नि देते है | की उनकी सदगति हो और उन्हें मोक्ष प्राप्त हो |

उत्तर वाहिनी माँ सरयू के इस पवन तट गौरी शंकर घाट पर क्या नहीं था | पक्काघाट पक्का बिश्राम स्थल धर्मशालायो मंदिरों आदि सारे संसाधनों से परिपूर्ण यह स्थान काफी रमणीक लगता था चाहे कार्तिक पुर्णिमा का स्नान हो, चाहे सूर्य ग्रहण या चन्द्र ग्रहण का स्नान हो या अन्य कोई धार्मिक पर्व हो, यहाँ हर समय आनंद ही आनंद रहता था | लेकिन वर्ष 1989 का काल खण्ड इस स्थान का ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र के दुर्दिन का समय था अचानक माँ सरयू की उफनती लहरों ने देखते देखते पहले शमसानघाट के दक्षिण संत नागा बाबा की कुटी से लेकर दुर्गा मंदिर तक एक -एक कर सारे पक्के घाट समशान घाट कृषि योग्य भूमि, खाकी बाबा कुटी, सहित शिव मंदिर का भी आंशिक भाग अपनी गोद में समाहित कर लिया, जो शेष बचा उसे सिचाई बिभाग व् जिला प्रसाशन ने बचाने में अपनी असमर्थता जाहिर कर दी, जिसे वाध्य होकर स्थान्तरित करना पड़ा| और निरंतर सदियों से गुलजार रहने वाला यह पबित्र स्थान बिरान हो गया | भगवान श्री राम द्वारा स्थापित शिवलिंग व् उसी के पास में श्रीराम जानकी मंदिर का वही गौरीशंकर घाट रोड पर, श्री मुन्नीलाल साहू व श्री भजुरामा प्रसाद साहू द्वारा , दान में दी गयी भूमि पर, स्थानांतरित कर एक भब्य मंदिर का निर्माण करा दिया गया, जो अब सुरक्षित है लेकिन सदैव हसता मुस्कराता स्थान यह शिवलिंग के स्थानांतरित होते ही अपनी बची खुची रौनकता को भी खो दिया, यह स्थान अब उबड़ खाबड़ उजाड़ खण्ड लगने लगा, लोगो के उठने बैठने, के लिए गर्मी व् बर्षात के दिनों में खुला आसमान हो गया | नीचे बैठने के लिए बोल्डरो व पत्थरों के बिछावन में तब्दील जो गया, यहाँ कुछ देर तक बैठना किसी सजा से कम नहीं था, किन्तु सदियो से अपने परिजनों के शव को सदगति प्राप्त करने की धारणा से लोग यहाँ दाह संस्कार करने के लिए दूर दूर से आते रहे | अपने परिजन के पार्थिव शारीर को पञ्च तत्व मे बिलीन होने के बाद, उसकी राख़ को माँ सरयू की धारा में प्रवाहित करने तक लोग यहाँ दो तीन घंटा जरुर रुकते, और यहाँ का काम सम्पन्न होने के उपरांत लोग स्नान करने के लिए, लगभग एक किलो मीटर की दूरी तय कर सम्पन्न रामघाट जाते या चापा कल से, अपने ऊपर पानी छिणक कर अपने घर को चले जाते, जो उन्हें अच्छा नहीं लगता यही कारण था की लोग धीरे -धीरे साधन सम्पन्न शमसानघाट की और पलायन करना शुरू कर दिए जिन्हें रोकना एक कठिन कार्य था बड़हलगंज की ओर जाने वालो की संख्या दिन पर दिन बढती जा रही थी

हम उन्हें रोकते भी तो किस आधार पर, बोल्डरो और पत्थर के टुकड़ो तथा दो अदद आम के पेड़ो के अलावा यहाँ क्या था | लेकिन जिन लोगो की आस्था इस स्थान से जुडी थी | उनके लिए यही दो आम के पेड़ , कड़ी धुप में भी , शीतलता प्रदान कर रहे थे | धीरे धीरे समय बीतता जा रहा था | एक मूक दर्शक के अलावा | हम सब कुछ कर पाने में, अपने को असमर्थ पा रहे थे | क्योकि हम लोगो के पास न तो जमीन थी, ना ही प्रयाप्त पैसा , मै नगर पंचायत अध्यक्ष पति श्रीमति मनोरमा देवी के होने के कारण अपनी जिम्मेदारी को बखूबी समझते हुए भी लाचार व असहाय था क्योकिं मेरे सामने ही मा० दया राम पाल जी द्वारा एक शेड बनवाने का प्रयास बिफल हो गया था | अपनी भूमि न होने के कारण उन्हें तीन बार स्थान बदलना पड़ा | फिर भी वह शेड नहीं बन पाया और वह कार्य अधुरा रह गया आनन् -फानन में कुछ पिलर ही बन पाया की आपत्ति हो गयी | और यह निर्माण कार्य रुक गया | मन में कुछ करने की लालसा होते हुए भी हम कुछ करने में ,अपने को असमर्थ पा रहे थे | उधर शवो का पलायन रुक नहीं रहा था | लेकिन एक कहावत है की "जब निको दिन आइहे बनत ना लगिहे देर" और वह अच्छा दिन तब आया जब हम अपने एक अच्छे साथी पंडित त्रिभुवन दूबे को खो दिए, वह दिन था बुधवार १७ अक्तूबर २००१ का, जब पंडित त्रिभुवन दुबे का निधन हो गया था | जो मा० फागू चौहान के बहुत करीब थे पंडित जी के घर उनके शुभचिंतक आकर उनके परिजनों को सांत्वना दे रहे थे | उनके आवास पर पहुचने वालो में मा० मंत्री श्री फागू चौहान जी भी थे जो उनकी शव यात्रा में, उनके गौंव से पैदल चलकर गौरी शंकर घाट के, उस बिरान श्मशान भूमि पर पहुचे, जहाँ खड़े दोनों आम के पेड़ो ने उनका स्वागत किया और थकान को दूर करने के लिए शीतलता प्रदान किया , बाजार से दरी मगवाकर वहा बिछवाया गया उसी पर मा० मंत्री जी और अन्य लोग बैठे और तरह तरह की चर्चाओ का दौर प्रारंभ हुआ ऑर समय -समय पर बिस्तार को भी छाया की तरफ सरकाया जाने लगा दो घंटे में अनेक बार दरी को इधर से उधर किया गया और अंत में मा० फागू चौहानजी ने कह ही दिया की गुलाबजी यदि आप यहाँ इस जगह जमीन उपलब्ध करा दे तो मै अपने बिधायक निधि से एक शेड बनवा दूंगा | वर्षो से जिस काम को मै चाह कर भी नहीं कर पा रहा था , उसे मा० मंत्री जी ने महसूस किया और मुझे शेड के निर्माण के लिए अपने बिधायक निधि से पाँच लाख रूपये देने का भी आस्वासन दिया, उसी समय मैंने मन ही मन संकल्प किया की इस पुनीत कार्य को किए बिना, मै चैन से नहीं बैठूगा , जब मन में चाहत हो तो, ब्यक्ति क्या नहीं कर सकता धन की उपलब्धता के साथ ही स्मशान घाट के पास एक शेड बनाने किया हमारा संकल्प साकार होता नजर आने लगा | मैंने जमींन किन किन लोगो की है किनसे सम्पर्क किया जाय केसेस प्राप्त होगी

क्योंकि यह भी हमारे लक्ष्य की एक कठिन चुनौती थी | सबसे पहले मैंने क्षेत्र के लेखपाल श्री सुधाकर, श्री राम सेवक व श्री राम दरस सिंह से समपर्क किया | क्योंकि यह तीनो लोग एक ही साथ रहा करते थे | और तव मुझे पता चला की कटान दसे प्रभावित श्मशान भूमि के पास दो सौ उन्नासी एअर भूमि ग्राम समाज की है | तथा उसी ग्राम सभा में शेष भूमि कई लोगो के नाम से है बंजर /ग्राम समाज की भूमि के बारे में, बताया गया की ग्राम प्रधान यदि प्रस्ताव कर दे तो यह भूमि आप को मिल सकती है | अब एक समस्या और सामने आ गयी , की यह भूमि किस नाम से प्रस्तावित किया जाय, यह काम नगर पंचायत द्वारा भी कराया जा सकता था | उसके नाम से जमीन का प्रस्ताव भी हो सकता था | लेकिन इसका भबिस्य कितना उज्जवल होगा | मुझे खुद संसय होने लगा मैंने मन में कहा नहीं इस पुनीत कार्य को निर्बाध गति से चलाने के लिए उचित होगा एक कि स्वत्रंत कमेटी का गठन कर रजिस्ट्रेशन करा लिया जाय | और तब उसके नाम से, यह जमीन हस्तांतरित हो, तभी सफलता मिलेगी और मैंने जब अपने बिचार से लोगो को अवगत कराया तथा मुक्तिधाम की महत्ता का बर्णन करते हुए इसके निर्माण के लिए प्रस्ताव रखा तो लोगो को हमारी बातो पर बिस्वास नहीं हो पा रहा था | सभी लोग इस प्रस्ताव को सूरज के दीपक दिखाने जैसी उपमा देने लगे

बड़ी कठिनाई से मैंने कुछ लोगो को इस पुनीत कार्य के लिए राजी कर सका था सच तो यह है की चाहता था की मुक्तिधाम के निर्माण के लिए जिस कमेटी का मै गठन करू वह निविर्वादित हो उसमे अच्छे छबि के लोग हो | और मेरे ऊपर उनका अटूट बिस्वास हो ऐसे लोगो के चयन के विषय में जो नाम उभर कर सामने आया उनमे सर्व श्री डा० बी० के० श्रीवास्तव , श्री कपूरचंद, श्री बृजेश कुमार, श्रीलालजी राय, श्री जितेंद्र राय, श्री विनय कुमार जायसवाल, श्री स्वतन्य कुमार, श्री रबिन्द्र वर्मा, श्री राजेश कुमार मदेशिया और श्रीमती मनोरमा देवी का जिनको मिलाकर मुक्तिधाम सेवा संस्थान नाम से कमेटी का गठन हुआ | जिसमे संस्था के अध्यक्ष के रूप में डा० बी० के० श्रीवास्तव का नाम सर्व समस्त प्रस्तावित किया गया | सभी सम्मानित पदाधिकारियो और सदस्यों ने संस्था के लक्ष्य की पूर्ति में भरपूर सहयोग करने का संकल्प लिया, तथा मुझे भरपूर सहयोग का आस्वासन दिया ततपस्चात मैंने श्री प्रजापति राय से ग्राम सभा की दो सौ उन्नासी एअर भूमि के प्रस्ताव के लिए श्री लालजी राय तत्कालीन प्रधान श्रीमती सुशीला राय के पति देव से प्रस्ताव पास करने के लिए निवेदन किया जिसे तत्काल स्वीकार कर लिया गया और वहा के सेक्रेट्री को बुलाकर बैठक की कार्यवाही प्रारंभ हुयी जिसमे उप्स्तिथिति सभी लोगो ने अपनी सहमती ब्यक्तकर दी उपस्थिति निम्न प्रकार थी श्रीमती सुशीला राय, ग्राम प्रधान
श्री राधेश्याम, उपप्रधान
श्रीमति सुनीता देवी, सदस्य
श्रीमति चनपटिया देवी ,सदस्य
श्रीमति रनिया देवी,सदस्य
श्रीमति शनिचरी देवी , सदस्य
श्री गंगा प्रसाद , सदस्य
श्री चन्द्रपति मौर्य , सदस्य
श्री रामहरख , सदस्य
श्री राम मणि राय , सदस्य
श्री अमावस यादव
श्री हरिवास
श्री दिनेश
श्री शिव कुमार यादव

ग्राम सभा से, प्रस्ताव पारित होने के पस्चात तत्कालीन लेखपाल श्री रामसेवक, कानूनगो श्रीराम सकल मौर्य, नायव तहसीलदार श्री अजीत कुमार जायसवाल व तहसीलदार श्री त्रिभुवन बिस्वकर्मा द्वारा अपनी-अपनी आख्या संस्तुति सहित तत्कालीन उप जिलाधिकारी श्रीमन दूधनाथ सिंह जी के समक्ष प्रस्तुत किया गया जिसको तत्काल उपजिला अधिकारी महोदय की स्वीकृति मिल गयी | तथा तहसील के अभिलेखों में 271 एअर भूमि पर मुक्तिधाम का नाम अंकित कर दिया गया | मेरे संकल्प का यह पहला चरण था जिसको पूर्ण होने के उपरांत मुक्तिधाम के निर्माण का मार्ग प्रसस्त हो गया परन्तु मेरी कल्पना के अनुरूप भब्य मुक्तिधाम का निर्माण 271 एअर में कतई संभव नहीं था इसलिए आस पास की भूमि प्राप्त होना नितांत ही आवश्यक था किसी तरह हिम्मत जुटा कर आस पास के भूस्वामियों से मिला यह एक अच्छा संयोग था के सभी लोग सुपरिचित व अतिघनिष्ट निकल गए और इस पुनीत कार्य के लिए अपनी जमीन को सहर्ष दान कर दिया ऐसे हमारे पूर्व परिचितों में श्री रामपलत राय जी, श्री मारकंडेय राय, श्री ओमप्रकाश राय, श्री जीतेन्द्र राय नेता जी विनोद राय, आदि रहे जिनका हम ह्रृदय से आभार ब्यक्त करते है शेष लोगो को भी शत शत नमन जिन महान भूमि दान दाताओ की सूचि निम्न प्रकार है...दान दाताओ की सूची यंहा क्लिक करे

उपरोक्त समस्त महान भूमि दान दाताओ की, स्वीकृति प्राप्त होने के बाद मुक्ति धाम के लिए धन संग्रह का कार्य नितांत आवश्यक था इधर उधर जाने से पहले भूमि पूजन सिलान्यास के माध्यम से ब्यापक प्रचार प्रसार कराने का निर्णय लिया गया, तथा मा० फागू चौहान को उनका संकल्प भी याद करना जरुरी था इसलिए 30 सितम्बर 2003 को मुक्तिधाम के सिलान्यास की तिथि निर्धारित की गयी कार्यक्रम का मुख्य अतिथि मा० फागू चौहान को बनाया गया जिसमे आप बिश्वास नहीं करेंगे कुल आठ लाख की धनरासी की घोषणा मंच के मध्याम से हुई मुख्य अतिथी मा० फागू चौहान ने अपने विधायक निधि से पांच लाख रु( 5,00,000/- रु) दिया और उनके भाई भी शिव कुमार चौहान ने दस हजार रु (10,000/-) तो श्री इन्द्रजीत सिंह पकड़ी बुजुर्ग ने भी रूपये 10,0000/- और फिर तो एक -एक का तमाम लोगो ने कुछ ईंट तो कुछ ने नकद 'कुल मिलाकर उसदिन आठ लाख की धनराशि प्राप्त हुई और इसी दिन से मुक्तिधाम के निमार्ण का कार्य प्रारम्भ हो गया और तब से आजतक कभी निर्माण कार्य रुका नहीं, उस समय जहाँ उधर शव जलाया जाता था, वहा पक्का घाट बनाने की गुंजाईश नहीं थी बगल की भूमि दान में मिली भूमि के गटर संख्या से अलग कृषि योग्य भूमि थी, और उस ससमय वही एक ऐसी भूमि वह थी जिसपर शव दाह के लिए स्टेप व नदी के तल तक सीढ़ी आदि के निर्माण के लिए उपयुक्त थी | वह भूमि बाबु श्री शंभूदत्त राय, श्री जिउतबन्ध राय निवासी धनौली की थी | जिसे पाना मुझे कठिन प्रतीत हो रहा था मै नियमित रूप से बाबु साहब के यहाँ जाता था उनका चाय पिता था, और बिना कुछ कहे वापस चला आता था उनसे कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था समभवतः श्री शम्भू दत्त राय बाबु साहब ने हमारी मनसा को भाप लिए थे और खुद मेरे मन की बात कह डाली और शव दाह के लिए निर्मित होने वाले स्टेप व् चबूतरा तथा आगे एक शैड व् मार्ग बनाने का प्रमोक्ष स्थान देना स्वीकार किया | जहाँ आज श्रीदेह स्वर्गीय रामप्यारे सिंह के प्रयास से मा० अमरसिंह सांसद द्वारा रु 5,00,000/- पांच लाख रुपये तथा स्वर्गीय रामसागर राय निवासी बुढ़वरने 1,25,000/- एक लाख पचीस हजार के धनराशि प्रदान किए जिससे वहाँ अपनी योजना के अनुरूप निर्माण कार्य कराया जा सका है | पहले जहाँ शव जलाया जाता था, और वहा भारत माता मंदिर का निर्माण करा कर माँ सरयू के धारा को प्रवर्तित कर दिया गया है, जिससे मुक्तिधाम से निचे पुल के पास तक अच्छा खासा सिल्ट जमा हो गया हैं | और आज दोहरी घाट नदी के काटन से काफी हद तक सुरच्छित हो गया हैं | हम चाहते हैं की आगे ऊपर की तरफ नागा बाबा के कुटी के आगे एक ऐसा ही ठोकर बन जाये जो ग्राम रामपुर घनौली के कीमती कृषि योग्य भूमि के साथ - साथ मुक्ति धाम को भी सुरक्षा प्रदान कर सके हमारा यह प्रयास निरंतर बना रहेगा


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